मैंने आज यह किताब पढ़ी और पढ़ते-पढ़ते मैं कहीं खो गया। कई बार ऐसा लगा कि यह मेरी ही कहानी है। आज मैं शायद बंटी से काफी बड़ा हूँ और मेरे माता-पिता का तलाक भी नहीं हुआ, फिर भी पता नहीं क्यों, इस किताब का बंटी मुझे अपना सा लगने लगा।
जब बंटी अंतर्मुखी (introvert) बन गया, जब वह खुद में ही रहने लगा, तब ऐसा लगा कि यह शायद कई सारे अंतर्मुखी बच्चों की कहानी है—मेरी भी। जीवन के इस पड़ाव पर भी मन में कई बातें चल रही हैं और सोचता हूँ कि आज तो कह ही दूँगा ये बातें, जैसे बंटी सोचता है, पर कह नहीं पाता—जैसे बंटी नहीं कह पाता।
शायद जो लोग अंतर्मुखी हैं, उन्हें इस किताब का एक हिस्सा ज्यादा relatable लगेगा। इस किताब में मन्नू भंडारी जी ने एक बच्चे के मन को बहुत ही अच्छे तरीके से उकेरा है। उसके मन की व्यथा, उसकी माँ के प्रति प्रेम और गुस्सा—सब कुछ इस तरह लिखा है कि लगता है, बचपन में हमने भी ऐसा ही किया होगा। माँ पर गुस्सा किया होगा और फिर गुस्सा होने के बाद वैसे ही सोचा होगा, जैसा बंटी सोचता है।
अगर आप यह पढ़ रहे हैं, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा—आप यह किताब ज़रूर पढ़ें।
Leave a comment